The story of Tata's business

Written By: FirstU Team | New Delhi

 

Tata के कारोबार का किस्सा

इतिहास के पन्नो में इंसान को काबिल बनाने में व्यापार का बहुत बड़ा योगदान रहा है... अगर व्यापार की समझ इंसान में नहीं आती तो इस आधुनिक दुनिया की कल्पना करना भी शायद मुश्किल होता... आज इस सभ्य समाज में... आप और हम भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, तो केवल.. व्यापारिक लेन देन और व्यापारिक समज के कारण... नमस्कार ... में रोहित कौशिक आपके लिए ला रहा हूं... इतिहास के पन्नो से लेकर आधूनिक दुनिया के हर व्यापार की कहानी को... आप तक पहुंचाउंगा

आज की कहानी... अब से करीब 150 साल पहले शुरू हुए कारोबार की है... इस कारोबार ने आज के आधुनिक भारत के व्यवसाय की नीव रखी थी... या यूं कहिए भारत को कारोबार करना सिखाया था... हम बात कर रहे हैं टाटा के कारोबार की... जिसकी नीव जमशेदजी टाटा ने 1868 में रखी थी... टाटा के 150 साल के कारोबारी इतिहास को शब्दों में बतापाना असान नहीं... लेकिन हम कौशिश करेंगे की आपको 1868 के जमशेदजी टाटा के कारोबारी दौर से ... आज के रतन टाटा जी के कारोबारी समय में ले आएं...

सन 1868 का वो दौर बहुत मुशिकिलो भरा हुआ करता था। अंग्रेज़ हुकुमत भारत पर राज किया करती थी। उस दौर में किसी भी कारोबारी के लिए अपने व्यवसाय को जमाना आसान काम नहीं हुआ करता था... लेकिन 29 साल की उमर में 21000 रूपए की पुंजी के साथ जमशेदजी ने अपने कारोबार की नीव रखी... हालांकि, जमशेदजी का परिवार पहले से ही कारोबार किया करता था... आपको जानकार शयद हैरत हो कि टाटा फैमिली शुरुआत में अफीम का कारोबार किया करती थी. जो आज के समय में तो इललिगल है...  लेकिन उस जमाने में चीन से किया जाने वाला अफीम का यह कारोबार कानूनी हुआ करता था. दरअसल, पूरी दुनिया में अपना एम्‍पायर खड़ा करने के लिए पश्चिमी देश भयानक मार-काट किया कर करते थे. युद्ध में घायल सैनिकों को दर्द से निजात दिलाने के लिए उस समय सबसे बेहतर ऑप्‍शन अफीम हुआ करती थी. यहीं कारण था की उस समय जमशेदजी का परिवार अफीम का कारोबार किया करता था...लकिन बाद में जमशेदजी ने ही अपनी परिवार को अफीम के कारोबार से निकालकर एक बड़े बिजनेस एम्‍पायर में बदला.  

1868 में शुरू किए गए कारोबार में उनको असानी से सफलता हाथ नहीं लगी... कई बार विफ्लताओं का मुहं देखना पड़ा... लेकिन समय के साथ साथ व्यापार में तबदीली करते हुए जमशेदजी ने 4 बड़ी परियोजनाएं लगाईं...या यूं कहिए 4 बड़े लश्य रखे... इन लश्यों में थी एक स्‍टील कंपनी, एक वर्ल्‍ड क्‍लास होटल, एक एजुकेशनल इंस्‍टीट्यूट और एक जलविद्युत परियोजना यानी (Hydro-electric plant). इनके पीछे जमशेदजी की भारत को एक आत्‍मनिर्भर देश बनाने की सोच थी. हालांकि उनकी जिंदगी में सिर्फ एक ही परियोजना पूरी हो सकी, वो था होटल ताज... ताज होटल के बनने के पिछे भी एक छोटा सा किस्सा है... दरअसल, एक बार जमशेद जी, एक महंगे होटल में गए, जहां से उनको उनके रंग के चलते होटल से बाहर जाने को कहा गया... इस वाक्य से उनके मन को इतनी ठेस पहुंची की उन्होंने उसी वक्त तय किया कि वे भारतीयों के लिए इससे बेहतर होटल बनाएंगे... और ऐसा उन्होने करके दिखाया... 1903 में मुंबई के समुद्र तट पर ताज महल पैलेस होटल तैयार हो गया... यह मुंबई की पहली ऐसी इमारत थी, जिसमें बिजली थी, अमरीकी पंखे लगाए गए थे, जर्मन लिफ़्ट मौजूद थी और अंग्रेज ख़ानसामा भारतीयों के लिए खाना पका रहे थे...ये होटल दिसम्बर 1903 में लगभग 4,21,00,000 रुपये की मोटी रकम से तैयार हुआ था। इसमें भी उनकी राष्ट्रवादी सोच साफ दिखाई देती है। बाद में उनके अधुरे सपनों को टाटा की आने वाली पीढ़ियों ने पूरा किया. इन्‍हीं 4 परियोजनाओं के चलते टाटा ग्रुप की भारत में कारोबारी हैसियत बनी. उनकी इन्हीं सफलताओं ने पहली बार भारत को औद्योगिक तौर पर आत्‍मनिर्भर बनने का सपना भी दिया... 

यहां से शुरू होता जमशेदजी के बाद का कारोबारी सफर... 1901 में भारत में पहले बड़े पैमाने के लोहे के कारख़ानों का गठन शुरू किया और 1907 में इन्हें 'टाटा आयरन ऐंड स्टील कंपनी' के रूप में संगठित किया गया। उनके बेटे, सर दोराबजी जमशेदजी टाटा और सर रतनजी टाटा इन दोनों के निर्देशन में 'टाटा इंडियन स्टील कंपनी' न केवल भारत में Steel बनाने वाली निजी स्वामित्व की सबसे बड़ी कंपनी बनी बल्की ऐसे कंपनी समूह का केंद्र बन गई, जो न सिर्फ़... कपड़ा, Steel और बिजली उत्पादन करती थी, बल्कि रसायन, कृषि संयंत्र, ट्रक, रेल के इंजन और सीमेंट का भी निर्माण करने लगी थी। 

वहीं, 1898 में टाटा ने बंगलोर में एक शोध संस्थान के लिए भूमि दान की थी, जिसे बाद में 'इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस' के रूप में उनके बेटों द्वारा स्थापित किया गया। इसके बाद जे. आर. डी. टाटा का समय आया उन्होने 1932 में 'टाटा एयरलाइंस' की स्थापना की, जिसका 1953 में अंतर्राष्ट्रीयकरण हो गया और इसका विभाजन करके... इसको भारत की प्रमुख घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय हवाई सेवा, 'इंडियन एयरलांस कॉर्पोरेशन' और 'एयर इंडिया' का स्वरूप दिया गया। 'टाटा एयरलाइंस' से  जुड़ा भी एक छोटा सा किस्सा है... दरअसल, जेआरडी टाटा उद्योगपति नहीं बनना चाहते थे. उनका सपना पायलट बनने का था. इसके चलते वे लुइस बेलराइट से मिले थे, जिन्होंने 1909 में पहली बार इंग्लिश चैनल पर उड़ान भरने का कारनामा दिखाया था. आपको शायद न पता हो.. जेआरडी, भारत में पायलट बनने वाले पहले शख़्स थे. बांबे फ्लाइंग क्लब से जारी उनका लाइसेंस का नंबर... 1 था, जिस पर उन्हें काफी गर्व भी था... JRD टाटा ने भारत में पहली एयरमेल सर्विस शुरू की. तब वे उस विमान को ख़ुद ही उड़ाया करते थे. उस दौर में कोई रनवे नहीं था, तब वो कीचड़ की जमीन पर विमान उतारते थे और उड़ाते थे... यही मेल सेवा आगे चलकर भारत की पहली एयरलाइंस बनी जिसे आज आप एयर इंडिया के नाम से जानते हैं...जेआरडी ने 1968 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विस यानी (टीसीएस) की स्थापना की, ताकि कंपनी का पेपरवर्क कंप्यूटर के माध्यम से हो सकें... आज टीसीएस पूरे टाटा समूह की सबसे मुनाफ़े वाली यूनिट है, जो दुनिया भर में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की आपूर्ति करती है.

इसी बीच जे. आर. डी. टाटा के भतीजे रतन नवल टाटा 1962 में टाटा उद्योग समूह में शामिल हुए। 1991 में उन्होंने जे. आर. डी. टाटा के उत्तरधिकारी के रूप में टाटा समूह की मुख्य कंपनी 'टाटा संस लिमिटेड' का अध्यक्ष पद संभाला। अपनी मेहनत से टाटा समूह की छवि रतन टाटा ने बदल कर रख दी... एक के बाद एक सफलता हासिल करते हुए 1998 में टाटा मोटर्स की टाटा इंडिका बाजार में उतरी थी. लेकिन कार का ये कारोबार उतना अच्छा नहीं कर सकां जैसी उम्मीद थी... अब यहां भी एक छोटा सा बेजती और कामयाबी का किस्सा है... कहते हैं जब टाटा मोटर्स का कारोबार अच्छा नहीं कर रहा था तब... कुछ लोगों ने रतन टाटा को इसे बेचने की सलाह दी. इसके बाद फोर्ड ने इसे खरीदने में दिलचस्पी दिखाई. लेकिन यहां बात बनी नहीं... क्योकिं वक्त को कुछ और ही मंजूर था... दरअसल, दोनों कंपनियों की बैठक के दौरान टाटा के यात्री कारों के व्यवसाय में कदम रखने पर हैरानी जताते हुए फोर्ड के अधिकारियों ने कहा... कि वे टाटा का कार कारोबार खरीदकर उन पर अहसान करे रहे हैं. तब ये डील तो नहीं हुई... लेकिन रतन टाटा को इस वाक्या से ठेस बहुत लगी... लेकिन अब समय पहिंया धुमने वाला था... हालात बदले. भारत में यात्री कारों का बाजार खूब फला-फूला और साथ में टाटा मोटर्स का कारोबार भी. लेकिन...
2008 में दुनिया में आए वित्तीय संकट ने फोर्ड की हालत खस्ता कर दी... ऐसे में जब टाटा ने 2 अरब से ज्यादा डॉलर में फोर्ड से जगुआर लैंड-रोवर ब्रांड को खरीदा तो इस से फोर्ड को बड़ी मदद मिली... और तब फोर्ड के चेयरमैन बिल बोर्ड ने रतन टाटा को धन्यवाद दिया और कहा कि ‘आप JLR को खरीदकर हम पर... बड़ा एहसान कर रहे हैं.’ टाटा मोटर्स से जुड़ा एक और किस्सा है... जिसमें रतन टाटा को कामयाबी नहीं मिल सकीं... लेकिन इसमें भी उनकी सोच बेहद अच्छी थी... दरअसल, रतन टाटा चाहते थे की भारत का हर नागरिक अपनी कार में घुमें... जिसके लिए उन्होनें खूब महनत भी की... ननो के रूप में दुनिया की सबसे स्सती कार को बाजार में उतारा भी गया... लेकिन टाटा ननो को वो सफल नहीं मिली जो रतन टाटा चाहते थे... वैसे जरूरी तो नहीं जो इंसान चाहे वो उसे मिल ही जाए... इसलिए कई बार असफलता को भी अपनाना पड़ता है। 


रतन टाटा के कार्यकाल के दौरान ही साल 2004 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) को शेयर बाजारों में लिस्ट किया गया था. जो आज टाटा की सबसे मुनाफे वाली कंपनी बन चुकी है...भारतीय उद्योगों के विकास में उनकी भागीदारी के लिए रतन टाटा को भारत सरकार ने साल 2000 में 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था। और इसके 12 साल बाद 2012 में जब वो 75 साल के थे तब उन्होने अपने पद को छोड़ने का फैसला लिया... आज टाटा... चाय से लेकर ट्रक तक और नमक से लकर प्लेन तक सब कुछ बनाते हैं... टाटा ग्रुप में 100 से ज्यादा कंपनियां हैं। इन सभी का कंट्रोल टाटा सन्स के पास है।